Friday, June 26, 2020

हिंदू - गर्व या ग्लानि का शब्द

हमें स्वयं को हिंदू कहने या कहलाने पर गर्व होना चाहिए या ग्लानि का?
वैसे तो ये प्रश्न थोड़ा बेतुका होना चाहिए। लेकिन आज एक ऐसा वर्ग है जो कहता है कि ये शब्द विदेशियों का दिया हुआ है, इसलिए हमें इसपर गर्व नहीं करना चाहिए। दूसरी ओर स्वामी विवेकानंद जैसे विश्व विख्यात व्यक्ति ने कहा है कि गर्व से कहो हम हिंदू हैं। तो हमें किसपर विश्वास करना चाहिए? आइए इसे समझ के देखते हैं।
मान्यता ये है कि सिंधु नदी के पूर्व या सिंधु नदी के पार रहने वालों को विदेशियों के द्वारा, हिंदू या हिंदुस्तानी कहा जाता था। कुछ विदेशी भाषाओं में "स" शब्द का उच्चारण नहीं है इसलिए वो "सिंधु" को "हिंदू" कहने लगे। उदाहरण के रूप से फ़ारसी लोग "सप्ताह" को "हफ़्ता" कहते आए हैं।
इसका अर्थ ये हुआ कि हिंदू शब्द एक स्थान विशेष पर रहनेवालों के लिए उपयोग में था। इसका किसी विचारधारा या सम्प्रदाय से कोई सम्बन्ध नहीं था। और ये ठीक भी है। क्योंकि जितनी प्राचीन सभ्यताएँ हैं, उन्हें भौगोलिक आधार पर ही जाना जाता है जैसे, मिस्र की सभ्यता, रोम की सभ्यता या यूनानी सभ्यता।
इसमें हमारे समझने की बात ये है कि मज़हब के नाम पर पहचान बनाने की परम्परा पहले नहीं होती थी। इसका आरम्भ यहूदियों ने किया था। ये पहला ऐसा मज़हब है जिसका "गॉड" मानवजाति में भेदभाव करता है। लेकिन यहूदी कभी भी अन्यों को यहूदी बनाने के लिए लालायित नहीं थे। ये काम बीते दो सहस्र (हज़ार का उपयोग बंद करना चाहता हूँ) वर्षों में ईसाईयत और इस्लाम ने किया है। इन मज़हबों का जो "गॉड" या "अल्लाह" है वो अपने अनुयायियों और अन्यों में भेदभाव करता है।
ऐसी संकुचित मानसिकता विश्व के लिए नई थी। ये मज़हब जहां-जहां गए, वहाँ की मूल संस्कृतियों और पूजा-पद्दतियों को नष्ट कर दिया। जब इस्लामी आक्रांता भारतवर्ष में पहुँचे तो उनके लिए यहाँ के सभी वासी ग़ैर-मुसलमान थे, इसलिए घृणा के पात्र थे। द्वैतवादी, अद्वैतवादी, बौद्ध, जैन और बाद में सिक्ख, सभी काफिर/मशरिक़ थे। उनके लिए सब "हिंदू" थे। तब से ये हिंदू शब्द का "लेबल" हमें दे दिया गया है। बीते सात दशकों की क्षुद्र राजनीति ने बौद्धों, जैनियों और सिक्खों को हिंदू से पृथक कर दिया। 
इसका अर्थ ये है कि हमारा अपना लेबल इस लिए नहीं है क्योंकि हमारे पूर्वज इतनी संकुचित मानसिकता के नहीं थे कि पूजा करने के आधार पार पहचान बनाते या भेदभाव करते। इसपर हमें गर्व हैं।
भेदभाव तो हर समाज में होता है और होना भी चाहिए। हमारे पूर्वज जो भेदभाव करते थे वो था कर्मों और व्यवहार के आधार पार।  इसलिए एक रावण वेदों का ज्ञाता होते हुए भी नीच है और अपने सद्गुणों और बुद्धि के कारण विदुर हो या रविदास, वो महान हैं।
हिंदू कहने या कहलाने में कोई हानि नहीं है। परंतु हमारे पास एक बेहतर विकल्प भी है। हिंदू शब्द हमारे ग्रंथों में कहीं नहीं मिलता। जो लोग शुद्ध और सच्चा आचरण करते हैं उन्हें आर्ष ग्रंथों में आर्य कहा जाता है। और नीच व्यवहार करनेवाले को अनार्य। 
एक उदाहरण रामायण से ही मिल जाता है। जब कैकेयी राम के लिए वनवास माँगती है तो उस समय उसके इस व्यवहार के लिए महर्षि वाल्मीकि उसे भी अनार्या कहकर सम्बोधित करते हैं (वाल्मीकि रामायण २।१९।१९)। 
ये उदाहरण इसलिए देना आवश्यक है क्योंकि आज ऐसे कुतर्क करनेवालों की कमी नहीं है जो "आर्य" शब्द को किसी जाति विशेष से जोड़ने का दुष्प्रचार कर रहे हैं।
कवि मैथिलीशरण गुप्त ने हमारे समाज की इस स्थिति पर एक कविता लिखी है जो यहाँ उचित बैठती है -

हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी

आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी

भू लोक का गौरव, प्रकृति का पुण्य लीला स्थल कहां

फैला मनोहर गिरि हिमालय, और गंगाजल कहां

संपूर्ण देशों से अधिक, किस देश का उत्कर्ष है

उसका कि जो ऋषि भूमि है, वह कौन, भारतवर्ष है


यह पुण्य भूमि प्रसिद्घ है, इसके निवासी आर्य हैं

विद्या कला कौशल्य सबके, जो प्रथम आचार्य हैं

संतान उनकी आज यद्यपि, हम अधोगति में पड़े

पर चिह्न उनकी उच्चता के, आज भी कुछ हैं खड़े


वे आर्य ही थे जो कभी, अपने लिये जीते न थे

वे स्वार्थ रत हो मोह की, मदिरा कभी पीते न थे

वे मंदिनी तल में, सुकृति के बीज बोते थे सदा

परदुःख देख दयालुता से, द्रवित होते थे सदा


संसार के उपकार हित, जब जन्म लेते थे सभी

निश्चेष्ट हो कर किस तरह से, बैठ सकते थे कभी

फैला यहीं से ज्ञान का, आलोक सब संसार में

जागी यहीं थी, जग रही जो ज्योति अब संसार में


वे मोह बंधन मुक्त थे, स्वच्छंद थे स्वाधीन थे

सम्पूर्ण सुख संयुक्त थे, वे शांति शिखरासीन थे

मन से, वचन से, कर्म से, वे प्रभु भजन में लीन थे

विख्यात ब्रह्मानंद नद के, वे मनोहर मीन थे


आज बाज़ारू मीडिया के प्रभाव में आकार जो हमने ईमानदार शब्द को अपना लिया है वो इसी अधोगति का परिणाम है।ईमान का अर्थ होता है इस्लाम और ईमानदार का शाब्दिक अर्थ है मुसलमान। आशा है कि हम अपनी विवेक बुद्धि का उपयोग करते हुए अपने कथानक को अपने अधिकार में लेना आरम्भ कर देंगे। 

Tuesday, April 28, 2020

किसने तोड़े हिन्दू मंदिर? (भाग 2)|| Who destroyed Hindu temples? (Part 2)|| Exposing Faizan Mustafa

मैंने भाग 1 में फ़ैज़ान मुस्तफ़ा के एक विडिओ के बारे में बताया था कि किस प्रकार वो एक ऐसा भ्रमजाल फ़ैला रहा है कि हमारे देश में बौद्ध मत को समाप्त करने में सनातन धर्मियों की भूमिका है न कि मुसलामानों की। इस प्रकार वो आज के हिन्दुओं में एक ग्लानि भाव भरने का प्रयास कर रहा है। हम जानते हैं कि आज के हिन्दू या मुसलमान तो इतिहास में पीछे जाकर कुछ परिवर्तन नहीं ला सकते लेकिन इनका ऐसे वीडियो बनाने का एक उद्देश्य होता है इस्लाम को एक साफ़-सुथरा मज़हब सिद्ध करना। ये जताना कि इस्लाम में कोई बुराई नहीं है, ये तो सनातन धर्म की और हिन्दुस्तान की परम्पराएं ऐसी रही हैं कि यहाँ मत और सोच के आधार पर या मज़हब के आधार  प्रताड़ित किया जाता रहा है। और जैसे जैसे आगे कृष्ण जन्म-भूमि का विषय उठेगा वैसे-वैसे ये लोग और प्रखर होते जाएंगे। ये बीते कई दशकों से यही काम कर रहे हैं। 

अपने इस वीडियो में फ़ैज़ान मुस्तफ़ा जी ने ये जताने का प्रयास किया है कि मिहिरकुल नाम का एक शिव भक्त था  जिसने बहुत से बौद्ध विहारों और स्तूपों को तोड़ा था बौद्ध मतावलम्बियों का नरसंहार भी किया था। 
इस वीडियो को देखते हुए जी पहले तथ्य पर ध्यान जाता है वो ये है कि जिस पृष्ठ को वो दिखा रहा है उसमें कहीं भी मिहिरकुल के शिव भक्त होने का उल्लेख नहीं है, ये शब्द मुस्तफ़ा जी ने अपनी ओर से जोड़ दिए हैं। 
ये छद्म इतिहासकारों की एक बहुत पुरानी चाल है। वर्षों पहले, रोमिला थापर ने भी ऐसा ही कुछ किया था। उसे मार्क्सवादी इतिहास लेखकों की माँ माना जाता है। इस का एकदम सटीक उत्तर एक बहुत ही प्रखर इतिहासकार सीताराम गोयल जी ने दिया था। उन्होंने अपनी पुस्तक "हिन्दू टेम्पल्स: व्हाट हप्पेनेड टू देम (पार्ट 2)" में मिहिरकुल वाले इस आक्षेप का तथ्यात्मक उत्तर दिया था। उन्होंने इस पुस्तक में बताया कि उन्होंने रोमिला थापर को एक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने ये आग्रह किया था कि इस प्रकार के सभी प्रकरणों की एक सूची उन्हें प्रदान की जाए जिसमें हिन्दुओं ने किसी और के पूजा स्थलों का विनाश किया हो। उस समय रोमिला थापर ने ठीक यही आक्षेप लगाया था जो फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने अपने वीडियो में लगाया है। 
आइए इस आक्षेप का आकलन करते हैं:-
सर्वप्रथम तो वो लिखती हैं कि चीनी यात्री ह्यूण त्सांग ने अपनी पुस्तक में उल्लेख किया है कि मिहिरकुल ने सैंकड़ों बौद्ध भवनों को ध्वस्त किया था लेकिन संभव है कि आप इसे अतिश्योक्ति और स्वयं एक बौद्ध होने के कारण उसका दुराग्रह मान लें किन्तु हमारे देश में एक और इतिहास की पुस्तक है राजतरंगिणी जिसे एक ब्राह्मण लेखन कल्हण ने लिखा है। संस्कृत में लिखी ये पुस्तक काश्मीर में लिखी गयी थी। वो भी उल्लेख करता है कि मिहिरकुल जोकि एक हूण था, उसने 1600 से अधिक बौद्ध भवनों को ध्वस्त किया था और सहस्रों बौद्धों का नरसंहार किया था। 

सीताराम गोयल 

सीताराम गोयल जी ने इसके प्रत्युत्तर में बताया कि रोमिला थापर जानबूझकर ये तथ्य छिपा गई कि पहले मिहिरकुल ने बौद्ध विहार में ये निवेदन किया था कि वो बौद्ध मत के विषय में सीखना चाहता है तो बुद्धों ने जानबूझकर किसी शिक्षक को भेजने के स्थान पर एक भृत्य को इस काम के लिए भेज दिया था। मिहिरकुल इससे आग बबूला हो उठा और उसने बुद्धों को प्रताड़ित करना आरम्भ कर दिया। यही तथ्य फ़ैज़ान मुस्तफ़ा ने भी नहीं बताया। 
दुसरे, उसने शैवमत की दीक्षा ली हो, इसकी संभावना बहुत कम है। उसने कुछ शिव मंदिर बनने दिए थे ये तथ्य है लेकिन वो शैव मत को सीख रहा था या कितना समझ पाया था, इसमें संदेह है। उसके सिक्कों पर एक ऐसी आकृति देखने को मिलती है जो शिवजी से मिलती-जुलती है। लेकिन वो शिव मत के अनुसार चल रहा था, इसमें संदेह है। सबसे बड़ी बात तो ये है कि शिव पुराण में या शैव मत की किसी पुस्तक में ये उल्लेख कहीं नहीं मिलता कि दूसरों के पूजा स्थलों को तोड़ना चाहिए। 

यहाँ मुल्ला-मार्क्सवादी-मिशनरी गुट के लोग ये चाल चलते हैं कि सीताराम गोयल जी तो हिन्दू विचारधारा के पक्षधर थे इसलिए उनपर विशवास क्यों किया जाए। यही बात हमारे भूतपूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की बेटी उपिंदर सिंह भी अपनी पुस्तक में देती हैं जोकि दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग की अध्यक्षा रही हैं और किसी भी सूरत में हिंदूवादी नहीं हैं। वो अपनी पुस्तक "पोलिटिकल वायलेंस इन अन्सिएंट इंडिया" के पृष्ठ 241 पर इसी घटना का उल्लेख करती हैं।
  
अब बात करते हैं राजतरंगिणी की। 
श्लोक 289 में कल्हण ने जहां मिहिरकुल का उल्लेख किया है, वो उसे म्लेच्छ कह रहा है न कि शैव। वो मिहिरकुल को कोई सम्मान नहीं दे रहा क्योंकि उसका चरित्र और व्यवहार ही ऐसा था। साथ ही वो उसे कालोपमो नृप कह रहा है; अर्थात ऐसा राजा जो काल के समान था। 
रोमिला थापर ने एक और बात कही थी कि मिहिरकुल ने गांधार में ब्राह्मणों को अग्रहार के लिए भूमि अनुदान में दी थी। इससे वो ये छवि बनाना चाहती है की मिहिरकुल एक हिन्दू, सनातन धर्मी या शैव था। अब देखिए कल्हण इस विषय में क्या कहता है। 


वो इन ब्राह्मणों के लिए द्विजाधम शब्द का उपयोग कर रहा है अर्थात ये अधम श्रेणी के द्विज अथवा ब्राह्मण थे जो मिहिरकुल से अनुदान ले रहे थे। इससे ये स्पष्ट हो जाता है कि हमारे देश की या सनातन धर्म में कभी भी पूजा स्थलों को तोड़ने वालों को सम्मान नहीं दिया गया बल्कि उन्हें अधम ही मन गया है। 
पर षड़यंत्रकारी लोग अर्धसत्यों के सहारे लेकर हमारे मन में ग्लानि भाव भरने का प्रयास करते हैं। आप सभी से निवेदन है सावधान रहें और अपनी सनातन संस्कृति पर गर्व कीजिये। 

नमस्ते!

Saturday, April 25, 2020

किसने तोड़े हिन्दू मंदिर? (भाग 1)|| Who destroyed Hindu temples? (Part 1)|| Exposing Faizan Mustafa

आज हम बात करनेवाले हैं एक व्यक्ति की जिनका नाम है फ़ैज़ान मुस्तफ़ा। ये हैदराबाद स्थित जो NALSAR यूनिवर्सिटी है उसके कुलपति या वाइस चांसलर हैं। आजकल आप इनको वो जितने टुकड़े टुकड़े गैंग  वाले टीवी चैनल्स हैं उनपर भी कभी कभी डिबेट्स में देख सकते हैं। कभी रविश कुमार के साथ या कभी करण थापर के साथ। क्योंकि एक जैसे हैं तो इन चैनल्स पर ज़रूर दिखाई देते हैं ये। इनका अपना भी यूट्यूब चैनल है जिसपर इनका कहना है की ये क़ानून के बारे में उस चैनल के माध्यम से जानकारी देते हैं। जिन दिनों हमारे देश में वो जो राम मंदिर वाला मुद्दा है सर्वोच्च न्यायलय में जब उसकी प्रतिदिन सुनवाई चल रही थी, तो उन दिनों ये सज्जन भी प्रति दिन उसपर विडिओ डाला करते थे और अकेले इसी मुद्दे पर इन्होने लगभग 10 - 15 विडिओ डाले हैं। उद्देश्य वही था जो ये मुल्ला-मार्क्सवादी -मिशनरी गिरोह है उनका जो उद्देश्य होता है कि हमारे देश के लोगों को बरगलाना, वही इनके विडिओ का भी उद्देश्य था। हमारे देश के लोगों को ये जताना कि मुसलमानों के साथ अन्याय हो रहा है, इस्लाम तो एक शांति का मज़हब है, इसने कभी भी मंदिरों में तोड़-फोड़ नहीं की। और इस देश की जो सनातन धर्म की मूल परम्पराएं हैं, वही घटिया हैं और उन्हीं के कारण ऐसी तोड़-फोड़ की घटनाएँ होती रही हैं।
आज हम जिस विडिओ की समीक्षा करेंगे उसमें इसने बताया है कि किस कारण से हमारे देश में जो मंदिर थे वो तोड़े जा रहे थे। टेम्पल डिस्ट्रक्शन के बारे में ये पूरे का पूरा विडिओ है इनका। अब ये लगभग सत्रह मिनट का विडिओ है लेकिन उसमें बीस से ज़्यादा गलतियां या झूठ मैंने देखे हैं तो इसलिए मैं एक विडिओ में वो सारा कुछ नहीं बता पाऊंगए। मुझे ऐसा लग रहा है की मुझे इसी के लिए एक सीरीज़ बनानी पड़ेगी।
तो आज हम शुरू करते हैं उसके पहले भाग से।



हमारे देश में बौद्ध मत जो है वो बहुत काम है, जो बौद्ध हैं वो बहुत कम रह गए हैं तो ये कमी आने का कारण क्या है, उसकी आज हम समीक्षा करने वाले हैं लेकिन फ़ैज़ान मुस्तफा ने इसके जो कारण दिए हैं, उन कारणों को जानने से पहले हम अपने देश के एक महापुरुष के विचार जान लेते हैं इसी विषय पर। इनका नाम था डॉक्टर भीमराव रामजी अम्बेदकर, जिन्हें हम बाबा साहेब के नाम से जानते हैं। बाबा साहेब ने इस्लाम पर, बौद्ध मत पर बहुत गहन अध्ययन किया था तो उनके विचार देखते हैं कि उन्होंने क्या कहा है (पुस्तक डाउनलोड करें) :-
इसमें कोई सन्देह नहीं है कि हिन्दुस्तान में बौद्ध मत का अन्त मुसलमान आक्रान्ताओं के कारण हुआ हैइस्लाम बुतों के शत्रु के रूप में आया थासब जानते हैं कि बुत एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ मूर्ति हैइस शब्द का अविर्भाव ही दर्शाता है कि मुसलमानों के अनुसार गौतम बुद्ध का संप्रदाय, मूर्तिपूजा का  पर्यायवाची हैमुसलमानों के लिए मूर्तिपूजाऔर बुत परस्ति  दोनों एक ही थेयही कारण था कि मूर्तियों को तोड़ने का जो उनका उद्देश्य था, वो बौद्ध मत के विनाश का कारण बना
तो यहाँ बाबा साहेब ये बता रहे हैं कि आपने सुना होगा कि मूर्ति को बुत कहा जाता है। वास्तविकता ये है की उन्होंने जब मध्य पूर्व से निकलना शुरू किया, अरेबिआ से निकले तो उस समय तक चारों ओर, जो बौद्ध मत है, उसका बहुत अधिक प्रभाव था। तो जो बुद्ध की प्रतिमाएं थीं उन्हें तोडना शुरू किया और बुद्ध से बुत शब्द बन गया और आज इस बुत शब्द को मूर्तिपूजा का पर्यायवाची माना जाता है। आगे देखिए बाबा साहेब ने क्या कहा है :-
इस्लाम ने बौद्धों का विनाश केवल भारत में ही नहीं किया। बल्कि जहाँ-जहाँ भी इस्लाम गया उसने यही किया। इस्लाम के आरम्भ से पूर्व, बौद्ध मत बैक्ट्रिआ, पार्थिआ, अफ्गानिस्तान, गान्धार, चीनी तुर्किस्तान के अतिरिक्त, सम्पूर्ण एशिआ में व्याप्त था।

मुसलमान घुसपैठियों ने बौद्ध विश्वविद्यालयों को लूटकर उनका विनाश कर दिया। इनमें नालन्दा, विक्रमशिला, जगद्दला और उदान्तपुरी कुछ उदाहरण हैं। हमारे देश में जितने बौद्ध विहार थे उन्हें मिट्टी में मिला दिया।
सहस्रों की सन्ख्या में बौद्ध भिक्षुओं को भारत से भागकर नेपाल और तिब्बत में शरण लेनी पड़ी। भिक्षुओं की एक बहुत बड़ी संख्या को मुसलमान आक्रान्ताओं ने मौत के घाट उतार दिया। मुसलमानों की तलवार ने किस प्रकार बौद्ध भिक्षुओं का सर्वनाश किया इसे स्वयं मुसलमान इतिहासकारों ने ही लिखा है।

अब ये जिन लेखकों की बात कर रहे हैं, हम उनमें से केवल एक का उदाहरण लेते हैं। तेरहवीं सदी में एक इतिहासकार हुए हैं इस्लाम के, जिनका नाम था मौलान मिन्हाजुद्दीन सिराज। इनकी एक पुस्तक है जिसका नाम है तबकात-इ-नासिरी। उसमें से मैं एक उदाहरण ले रहा हूँ। वो इसमें एक मोहम्मद बख्तियारुद्दीन इख्तियार खिलजी नाम के आक्रांता के बारे में बताता है। 

उसकी सेना में दो भाई थे निज़ामुद्दीन और शम्सुद्दीन। मैं सन् १२४३ में शम्सुद्दीन से लखनौती में मिला था। तब उसने मुझे जिस घटना का उल्लेख किया था उसे मैं बता रहा हूं। बख्तियार खिल्जी दो सौ सैनिकों के साथ एक दुर्ग के द्वार पर पहुंच गया और दुश्मनों को सम्भलने का मौका दिए बिना उन पर हमला कर दिया। ये दोनों भाई भी उसके साथ थे। इन्होने जल्दी ही दुर्ग पर कब्ज़ा कर लिया और इनके हाथों बहुत सा माल-ए-ग़नीमत लगा। वहाँ के अधिकतम् निवासी मुंडे हुए सिरों वाले ब्राह्मण थे। उन सभी को हमने मार दिया। वहाँ बहुत सी पुस्तकें थीं। जब मुसलमानों ने उन्हें देखा तो तो उन्होंने उनके विषय में जानने की कोशिश की। लेकिन सभी पुरुष मार दिए गए थे इसलिए कोई नहीं बता पाया कि उन पुस्तकों  में क्या लिखा है। हमें बाद में पता चला कि ये जिसे हम दुर्ग समझ रहे थे वो एक विश्वविद्यालय (मदरसा) था। हिन्दी भाषा में इसे विहार अथवा महाविद्यालय कहते हैं।

तो यहाँ वो एकदम स्पष्ट करके बताता है कि ये जो मोहम्मद बख्तियारुद्दीन इख्तियार खिलजी था, इसने विश्वविद्यालय को तहस-नहस कर दिया था और वहाँ जितने बौद्ध भिक्षु थे, उन्हें मार दिया गया था। और यही बात बाबा साहेब भीमराव रामजी अम्बेदकर ने बताई है। 
अब सुनते हैं फ़ैज़ान मुस्तफ़ा को कि वो इस विषय में क्या कहता है। इसने अपने इस वीडिओ में एक बहुत ही ड्रामैटिक कहानी सुनाई हैइसका कहना है कि एक बार जब ये चीन गया तो वहाँ एक टैक्सी चालक ने इससे एक प्रश्न कियासुनिए क्या कहना है इसका:-

उसका सवाल ये था कि इण्डिया में इतने काम बुद्धिस्ट क्यों हैं ? आपको मालुम है की ऑलमोस्ट एक दर्जन के करीब बुद्धिस्ट मैजोरिटी कंट्री हैं दुनिया में। जापान है, विएतनाम है, चीन है, थाईलैंड है, श्रीलंका है, म्यांमार है। और जहाँ बुद्धा का पूरा जीवन - यापन हुआ वहाँ आप देखिए की वो कितने कम हैं। मेरा सर शर्म से झुक गया क्योंकि फैक्ट ये है कि हमने बुद्धिस्ट को पर्सिक्यूट किया। हमने बुद्धिस्ट के टेम्पल्स को मोनस्ट्रीज को स्तूपास को डिस्ट्रॉय किया।  

हम्म..... 
हमने!
इस हमने में कौन कौन आता है, उसपे हम बादमें आएंगे लेकिन पहले ये जो पर्सिक्युट शब्द है, इसे समझ लेते हैं। ये शब्द अंग्रेजी भाषा का है जिसका अर्थ होता है - किसी को उसके मज़हब के आधार पर प्रताड़ित करना। वैसे आजकल इसमें नस्ल शब्द भी जोड़ दिया गया है लेकिन मूलरूप से ये जो शब्द था , ये उस समय उपयोग किया जाता था जब किसीको उसके मज़हब के आधार पर प्रताड़ित किया जाता था। विशेषरूप से, जब ईसाइयत का उदय हुआ तो उन्होंने वहाँ पर यहूदियों को पर्सिक्युट करना शुरू किया था। और क्योंकि इस्लाम भी लगभग वैसा ही मज़हब है इसमें पर्सिक्युट का जो पर्यायवाची शब्द है, वो है फ़ितना। जब आप किसीको मज़हब के कारण तंग करते हैं या प्रताड़ित करते हैं तो उसे फ़ितना कहा जाता है। हमारे देश में क्योंकि न तो इस प्रकार का कभी व्यवहार होता था और न ही ऐसी कोई मूल अवधारणा है, इसलिए इसका कोई शब्द आपको हिंदी या संस्कृत में नहीं मिलेगा तो हम इसे केवल प्रताड़ना मानकर ही चलेंगे। जब मैंने पहली बार फ़ैज़ान मुस्तफ़ा का ये विडिओ देखा तो बातें मुझे तुरंत खटकी। पहली ये कि ये जो लोग अपने को ज़्यादा पढ़ा लिखाबताते हैं, वो गौतम बुद्ध को बुद्धा कहना शुरू कर देते हैं। अँगरेज़ बुद्धा बोलते हैं, वो समझ में आता है, लेकिन हमारे ही देश के ये जो भूरी चमड़ी वाले लोग हैं, ये भी बुद्धा कहना शुरू कर देते हैं। दूसरा मुझे ये लगा जब इसने ये कहा कि मुझे शर्म आई तो मुझे लगा कि चलो कोई तो कम से कम ऐसा है जो मुसलमान घर में पैदा हुआ है लेकिन उसे इस बात की शर्म आई कि उन्होंने हमारे देश में बुद्धिज़्म का,बौद्ध मत का विनाश कर दिया। लेकिन जब थोड़ा सा आगे चले तब इसने अपना असली रंग दिखाया। इसका कहना ये है कि जो यहाँ पर बौद्ध मत का विनाश हुआ है, वो मुसलामानों ने नहीं किया, उससे पहले यहाँ पर जो हिन्दू थे, उन्होंने ये विनाश किया था। ये जो इसने कहा था कि हमने पर्सिक्युट किया, उस "हमने" में ये मुसलमानों की बात नहीं कर रहा। ये यहाँ पर हिन्दुओं की बात कर रहा है की जो यहाँ के मूल निवासी थे, जो सनातन धर्म था, उसने पर्सिक्युट किया है। ये भी देखिए ज़रा :-

अब एक और चीनी यात्री आते हैं, हियूंन सॉन्ग। जो इंडिया में आए 631 - 645 में। हर्षवर्धन का शासन हैं। वो क्या लिखता है, "वो लिखता है की छठी सदी का हूण शासक मिहिरकुल ने, जो एक शैव था, १६०० बौद्ध विहारों को तोड़ा और सहस्रों बौद्ध भिक्षुओं की हत्या करवाई। ये था जिसके कारण चीन में मेरा सिर शर्म से झुका था। 

तो इन सज्जन का कहना है कि मिहिरकुल जो कि एक शिव भक्त था, उसने सहस्रों बुद्धों के मंदिर तोड़े, उनके स्तूप तोड़े और सहस्रों बुद्ध अनुयायियों का नरसंहार किया। इसके विषय में हम अगले भाग में चर्चा करेंगे। 

नमस्ते!

यदि अच्छा लगा है तो भाग 2 भी देखें।